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इस्लामिक शरिया कानून और तालिबान के शरिया कानून, जानिए दोनों में क्या हैं अंतर

अफगानिस्तान में तालिबानी हुकुमत शुरू हो चुकी है. अफगान के एक सरकारी न्यूज़ चैनल की महिला एंकर शबनम डारवार ने बताया कि उन्हें तालिबान के लोगों ने दफ्तर जाने से रोका और कहा कि वो एक महिला है इसलिए वो काम नहीं कर सकती है. जबकि इससे दो दिन पहले ही तालिबान ने महिलाओं को शरिया कानून के तहत सभी अधिकार देने और काम करने की छुट देने की बात कही थी.

कई लोगों के मन में सवाल है कि क्या है शरिया कानून? इस्लामिक शरिया कानून और तालिबान के शरिया कानून में अंतर क्या हैं? तो चलिये आज हम आपके इन सवालों के जवाब देते हैं.

क्या है शरिया कानून?

शरिया कानून इस्लाम की कानूनी व्यवस्था है. यह कुरान और इस्लामी विद्वानों के फैसलों पर आधारित है. इसमें मुस्लिमों के दिनचर्या को लेकर एक आचार संहिता बताई गई है. कानून यह सुनिश्चित करता है कि मुसलमान जीवन के सभी क्षेत्रों खुदा की इच्छाओं का पालन करते हैं.

shiriya kanoon

शरिया कानून को लेकर अलग अलग व्याख्या मिलती है. काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशंस के स्टीवन ए कुक के अनुसार इसे लेकर कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं. कई जगहों पर इसे आसानी से राजनीतिक प्रणालियों में शामिल कर दीया गया है.

वहीं कई संगठन इसमें अंग-भंग और पत्थरबाजी को भी सही मानते है. इसमें कई क्रूर सजाओं के साथ-साथ विरासत, पहनावा को लेकर महिलाओं से सारे अधिकार छीन लेने को सही माना गया है. हालांकि इसकी व्याख्या और लागू करने का तरीका अलग-अलग मुस्लिम मुल्कों में अलग-अलग है.

वहीं पाकिस्तान जैसे मुस्लिम राष्ट्र में इस कानून को लागू नहीं किया गया है. इसमें किसी भी अपराध के लिए तीन तरह की सजा के बारे में बताया गया है.

तालिबान का शरिया कानून

तालिबान का अपना शरिया कानून है, 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने अफगान पर शासन किया और इस दौरान उन्होंने देश में कई सख्त नियम लागू किये. जिसे लेकर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा का शिकार भी होना पड़ा.

तालिबान ने सार्वजनिक तौर पर पत्थरबाजी की सजा, कोड़े मारना और बीच बाजार में फांसी पर लटका देने जैसे सजाएं लागू की. तालिबान ने शरिया कानून का हवाला देते हुए देश में हर तरह के गीत-संगीत को प्रतिबंधित कर दिया. चोरी करने पर हाथ काट देने की सजा का प्रावधान था.

तालिबान ने अपने पहले शासन में महिलाओं को पूरी तरह से नजरबंद कर दिया था और उनकी पढ़ाई-लिखाई रोक दी गई. लड़कियों की उम्र आठ साल होने पर बुर्का पहनना अनिवार्य था और वो अकेले घर से बाहर कदम भी नहीं रख सकती थी. इसी तरह की और भी कई पाबंदियां महिलाओं पर तालिबान के शरिया कानून के तहत लागू की गई थी.

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